तांदी के संगम स्थल पर खड़े हो कर देखें तो पश्चिम के उस अत्यंत भयावह पर्वत के पैरों में चंद्रभागा से काफी ऊपर उठा हुआ समतल पठार दिखता है, यही है गोशाल का हरा भरा गाँव . उत्तर पश्चिम की ओर खुली हुई पत्तन घाटी चंद्रभागा के साथ साथ फैली हुई है . इस घाटी में दूर दूर वस्तीयाँ हैं , गाँव हैं , हरी भरी खेतीयाँ हैं . गरमीयों के महीने में गंदम जौ और सर्दियों की सब्जियां उगाई जातीं हैं . यह सारा दृश्य बड़ा मनमोहक लग रहा था. मैंने बाद में विश्लेषण किया कि खोक्सर से ले कर इस संगम स्थल तक हमारी गाड़ी एक ही पर्वत के पेट के अगणित घूमों के चक्कर लगाती रही थी, मीलों मील. इस संगम स्थल पर नदियों की तीन लकीरें तीन घाटीयों का त्रिकोण जैसा बनातीं हैं. उत्तर पूर्व की ओर से आती हुई चन्द्र नदी मेरे मन में अद्भुत कल्पनाओं को जन्म देने लगी. एक्सम स्वच्छ नीले आकाश को बेंधती पहाड़ों की धवल नोकें. गाड़ी आगे सरकने लगी. सड़क के एक तरफ ऊंचे पहाड़ की ढलान पर बहुत सी जगहों पर स्वच्छ पानी के झरने भी दिखते रहे . एक स्थान पर पानी पीने के लिए उतरे थे उस मृदु ठन्डे पानी की खुश्बू मुझे अब तक याद है. लोगों ने बताया कि यह पानी प्राकृतिक जड़ी बूटीयों से होकर आता है इसलिए यह खुशबूदार हो जाता है. थोड़ी देर में के ऊँचे हिमतुन्गों के घेरों के बीचों बीच हरा भरा कैलोंग दृष्टिगोचर होने लगा. कैलोंग से पहले भी एक गाँव आया और एक बड़े घूम के सिरे पर भयंकर नाला आया. बड़े बड़े पत्थरों पर उछलता हुआ उग्र और वेगवान चिट्टा पानी, पूरे वातावरण में सिहरन पैदा करने वाली नमी फैलाता हुआ. पुल को पार करके सड़क फिर यू टर्न कर के उतनी ही दूरी तय करके कैलोंग के कस्वे में घुस गई. नर्म कच्चे हरे पत्तों वाले विल्लो के पेड़ों के समूह. बड़ा ही चक्शुप्रिय नज़ारा. एक क्षण के लिए तो लगा कि हम किसी काश्मीर के गाँव में आ गए. गाडी जहाँ खडी हुई उस सड़क के साथ ही पानी का चश्मा कल कल वह रहा था. मैं हाथ मुंह धोने लगा तो हाथ सुन्न हो गए. हवा भी इतनी ठंडी थी जैसे हमारे यहाँ दिसम्बर में होती है. मुझे याद आ रहा है कि सामान के बोझे उठाने के लिए चपरासी भी आ गया था, हालाँकि कुछ हमने भी ढोया. चपरासी का नाम याद नहीं आ रहा है. वह बहुत भला नेक आदमी था. उसका घर नदी पार के छोटे से गाँव में था. बैंक की बिल्डिंग में ही रहने के लिए क्वार्टर था.
Wednesday, 9 March 2016
लाहौल यात्रा के संस्मरण - 3
तांदी के संगम स्थल पर खड़े हो कर देखें तो पश्चिम के उस अत्यंत भयावह पर्वत के पैरों में चंद्रभागा से काफी ऊपर उठा हुआ समतल पठार दिखता है, यही है गोशाल का हरा भरा गाँव . उत्तर पश्चिम की ओर खुली हुई पत्तन घाटी चंद्रभागा के साथ साथ फैली हुई है . इस घाटी में दूर दूर वस्तीयाँ हैं , गाँव हैं , हरी भरी खेतीयाँ हैं . गरमीयों के महीने में गंदम जौ और सर्दियों की सब्जियां उगाई जातीं हैं . यह सारा दृश्य बड़ा मनमोहक लग रहा था. मैंने बाद में विश्लेषण किया कि खोक्सर से ले कर इस संगम स्थल तक हमारी गाड़ी एक ही पर्वत के पेट के अगणित घूमों के चक्कर लगाती रही थी, मीलों मील. इस संगम स्थल पर नदियों की तीन लकीरें तीन घाटीयों का त्रिकोण जैसा बनातीं हैं. उत्तर पूर्व की ओर से आती हुई चन्द्र नदी मेरे मन में अद्भुत कल्पनाओं को जन्म देने लगी. एक्सम स्वच्छ नीले आकाश को बेंधती पहाड़ों की धवल नोकें. गाड़ी आगे सरकने लगी. सड़क के एक तरफ ऊंचे पहाड़ की ढलान पर बहुत सी जगहों पर स्वच्छ पानी के झरने भी दिखते रहे . एक स्थान पर पानी पीने के लिए उतरे थे उस मृदु ठन्डे पानी की खुश्बू मुझे अब तक याद है. लोगों ने बताया कि यह पानी प्राकृतिक जड़ी बूटीयों से होकर आता है इसलिए यह खुशबूदार हो जाता है. थोड़ी देर में के ऊँचे हिमतुन्गों के घेरों के बीचों बीच हरा भरा कैलोंग दृष्टिगोचर होने लगा. कैलोंग से पहले भी एक गाँव आया और एक बड़े घूम के सिरे पर भयंकर नाला आया. बड़े बड़े पत्थरों पर उछलता हुआ उग्र और वेगवान चिट्टा पानी, पूरे वातावरण में सिहरन पैदा करने वाली नमी फैलाता हुआ. पुल को पार करके सड़क फिर यू टर्न कर के उतनी ही दूरी तय करके कैलोंग के कस्वे में घुस गई. नर्म कच्चे हरे पत्तों वाले विल्लो के पेड़ों के समूह. बड़ा ही चक्शुप्रिय नज़ारा. एक क्षण के लिए तो लगा कि हम किसी काश्मीर के गाँव में आ गए. गाडी जहाँ खडी हुई उस सड़क के साथ ही पानी का चश्मा कल कल वह रहा था. मैं हाथ मुंह धोने लगा तो हाथ सुन्न हो गए. हवा भी इतनी ठंडी थी जैसे हमारे यहाँ दिसम्बर में होती है. मुझे याद आ रहा है कि सामान के बोझे उठाने के लिए चपरासी भी आ गया था, हालाँकि कुछ हमने भी ढोया. चपरासी का नाम याद नहीं आ रहा है. वह बहुत भला नेक आदमी था. उसका घर नदी पार के छोटे से गाँव में था. बैंक की बिल्डिंग में ही रहने के लिए क्वार्टर था.
Saturday, 5 March 2016
लाहौल यात्रा के संस्मरण - 2
लाहौल यात्रा की अगली किश्त
मेरा छोटा भाई अनूप तब बहुत छोटा था। मैं इस बात का जरूर उल्लेख करना चाहूँगा कि जब पिता जी उसे स्कूल में दाखिल करने के लिए ले गए तो उसने पहली कक्षा में बैठने से इन्कार कर दिया. कायदे से तो दाखिला पहली जमात में ही मिलना था. हैडमास्टर साहिब को बड़ा आश्चर्य हुआ. उनकी लाख कोशीशों के बाबजूद यह नहीं माना . आखिर हैडमास्टर जी ने उससे कुछ प्रश्न पूछे . इसके उत्तरों को सुन कर हैडमास्टर साहिब को मानना ही पड़ा और अनूप को सीधे दूसरी कक्षा में दाखिला मिल गया.
हम जुलाई की छुट्टीयों में ही कैलोंग के लिए प्रस्थान कर चुके थे . हमारे मनों में इस अद्भुत अचिन्त्य प्रदेश को देखने की इतनी उत्सुकता थी कि जोखिम से भरी और थका देने वाली यात्रा की लेश भर भी परवाह नहीं थी। भागा के किनारे वाले पहाड़ की छोटी अगोचर थी. भागा नदी के ऊपर पुल को लांघ कर सामने कच्ची सड़क हमारी अगली यात्रा का स्वागत कर रही थी. सड़क के साथ साथ बड़ी नाज़ुक कच्ची नरम घास पनपती हुई देख कर मुझे और ही तरह का अनुभव हुआ. यूं लगने लगा कि सृष्टि की प्रथम घास जीवन के लिए संघर्ष कर रही हो. यहाँ का सारा दृश्य किसी और ही दुनियाँ से परिचय करा रहा था. उत्सुकता बरकरार थी . दरिया के पार एक जीप हमारे अगली यात्रा के लिए बुला रही थी . हमारी पीठों पर भारी बैग थे . ठण्ड इतनी थी कि काफी गर्म कपड़ों का बोझ तो हमारे शरीर ने पहले से ही उठा रक्खा था . जीप में जगह की तंगी थी . और भी सवारियां और उनके अपने अपने बोझे. कच्ची उबड़ खाबड़ सड़क पर जीप सरकने लगी . मोड़दार कच्ची सड़क कभी नाले की तरफ भीतर घुसती और फिर घूम कर दूसरे मोड़ तक आती और पुनः अगले और गहरे नाले के छोर को छू कर वापिस .. इस प्रकार अनेकों पुनरावृत्तियों के साथ चढ़ाई आ जाती और फिर मुड़ कर उतराई में आ जाती थी। सामने दूसरे पहाड़ की हरी मखमली पीठ पर इनी गिनी वस्तियाँ भी दिख जातीं थीं जिनके बीच बहुधा शिला लेख और गोम्पे भी नजर आते. सड़क के किनारे पत्थरों पर पत्थर रक्ख कर सजावटें और शैल पत्थरों पर भूटी भाषा में मन्त्र उकेरे हुए. रंगदार कपड़ों की झंडीयां जिन पर मन्त्र लिखे होते , हवा में पहराते हुए . भागा नदी सड़क से कभी दूर हो जाती तो कभी पास हो आती. हरी और स्लेटी र्रंग की वेगवान जलधारा . पता नहीं कितने मील तय करने के बाद लगने लगा कि इस गहरी घाटी के पाट खुलने वाले हैं। शुद्ध नीले अम्बर का एक टुकड़ा दो बेशुमार ऊंचे पर्वतों को हटाता हुआ नीचे उतरने लगा और हम विस्फारित आँखों से इस रोमांच भरे नवलोक के दृश्यों को अबोध बालकों की तरह देखते भी जाते और बीजी के साथ बतियाते भी जाते। पिता जी से कम बात होती थी। वह अकेले में अपने आप में अपने आप से से ही बतियाते लगते तो मुझे उनसे कुछ भी पूछने की हिम्मत नहीं जुट पाती थी। यह तो मैंने वार महसूस किया कि उनके मन में बड़ी इच्छा थी कि मैं पढ़ाई में बहुत आगे निकल जाता और आई ए ऐस की परीक्षा में सफल होता, क्योंकि तब तक मैं आठवीं की परीक्षा में स्कूल में दूसरे नंबर पर था। मुझे याद है कि मेरी स्मरण शक्ति और क्रिएटिविटी कल्पना शक्ति और कुछ नया करने का उत्साह बहुत था। खैर, जीप हमें खुली घाटी में ले आई। यह था चंद्र और भागा का संगम स्थल। पश्चिम में चट्टानी भयावह पर्वत, जिसके माथे पर भूरी स्लटी तिरछी तहें . जैसे शिव ने क्रोध से भृकुटी तनी हो और इस वृहद् प्रस्तर महा पिण्ड के पैंदे में बिछा हुआ गौशाल गाँव। हरा भरा। मुझे बताया गया कि वह एक बड़ा उपजाऊ क्षेत्र है और वहां काई धनाढ्य लोग रहते हैं। अब तक हमारी जीप याद नहीं कितने किलोमीटर तक उत्तर वाले विशाल पर्वत के एक ही ओर चक्कर लगा कर तांदी पहुंची तो लगा कि अब हमें एक पुल लांघ कर उत्तर पूर्व की ओर मुड़ना था, जिस ओर से शुद्ध नीली हरी चन्द्र नदी के घेरे आते हुए लग रहे थे .
मेरा छोटा भाई अनूप तब बहुत छोटा था। मैं इस बात का जरूर उल्लेख करना चाहूँगा कि जब पिता जी उसे स्कूल में दाखिल करने के लिए ले गए तो उसने पहली कक्षा में बैठने से इन्कार कर दिया. कायदे से तो दाखिला पहली जमात में ही मिलना था. हैडमास्टर साहिब को बड़ा आश्चर्य हुआ. उनकी लाख कोशीशों के बाबजूद यह नहीं माना . आखिर हैडमास्टर जी ने उससे कुछ प्रश्न पूछे . इसके उत्तरों को सुन कर हैडमास्टर साहिब को मानना ही पड़ा और अनूप को सीधे दूसरी कक्षा में दाखिला मिल गया.
हम जुलाई की छुट्टीयों में ही कैलोंग के लिए प्रस्थान कर चुके थे . हमारे मनों में इस अद्भुत अचिन्त्य प्रदेश को देखने की इतनी उत्सुकता थी कि जोखिम से भरी और थका देने वाली यात्रा की लेश भर भी परवाह नहीं थी। भागा के किनारे वाले पहाड़ की छोटी अगोचर थी. भागा नदी के ऊपर पुल को लांघ कर सामने कच्ची सड़क हमारी अगली यात्रा का स्वागत कर रही थी. सड़क के साथ साथ बड़ी नाज़ुक कच्ची नरम घास पनपती हुई देख कर मुझे और ही तरह का अनुभव हुआ. यूं लगने लगा कि सृष्टि की प्रथम घास जीवन के लिए संघर्ष कर रही हो. यहाँ का सारा दृश्य किसी और ही दुनियाँ से परिचय करा रहा था. उत्सुकता बरकरार थी . दरिया के पार एक जीप हमारे अगली यात्रा के लिए बुला रही थी . हमारी पीठों पर भारी बैग थे . ठण्ड इतनी थी कि काफी गर्म कपड़ों का बोझ तो हमारे शरीर ने पहले से ही उठा रक्खा था . जीप में जगह की तंगी थी . और भी सवारियां और उनके अपने अपने बोझे. कच्ची उबड़ खाबड़ सड़क पर जीप सरकने लगी . मोड़दार कच्ची सड़क कभी नाले की तरफ भीतर घुसती और फिर घूम कर दूसरे मोड़ तक आती और पुनः अगले और गहरे नाले के छोर को छू कर वापिस .. इस प्रकार अनेकों पुनरावृत्तियों के साथ चढ़ाई आ जाती और फिर मुड़ कर उतराई में आ जाती थी। सामने दूसरे पहाड़ की हरी मखमली पीठ पर इनी गिनी वस्तियाँ भी दिख जातीं थीं जिनके बीच बहुधा शिला लेख और गोम्पे भी नजर आते. सड़क के किनारे पत्थरों पर पत्थर रक्ख कर सजावटें और शैल पत्थरों पर भूटी भाषा में मन्त्र उकेरे हुए. रंगदार कपड़ों की झंडीयां जिन पर मन्त्र लिखे होते , हवा में पहराते हुए . भागा नदी सड़क से कभी दूर हो जाती तो कभी पास हो आती. हरी और स्लेटी र्रंग की वेगवान जलधारा . पता नहीं कितने मील तय करने के बाद लगने लगा कि इस गहरी घाटी के पाट खुलने वाले हैं। शुद्ध नीले अम्बर का एक टुकड़ा दो बेशुमार ऊंचे पर्वतों को हटाता हुआ नीचे उतरने लगा और हम विस्फारित आँखों से इस रोमांच भरे नवलोक के दृश्यों को अबोध बालकों की तरह देखते भी जाते और बीजी के साथ बतियाते भी जाते। पिता जी से कम बात होती थी। वह अकेले में अपने आप में अपने आप से से ही बतियाते लगते तो मुझे उनसे कुछ भी पूछने की हिम्मत नहीं जुट पाती थी। यह तो मैंने वार महसूस किया कि उनके मन में बड़ी इच्छा थी कि मैं पढ़ाई में बहुत आगे निकल जाता और आई ए ऐस की परीक्षा में सफल होता, क्योंकि तब तक मैं आठवीं की परीक्षा में स्कूल में दूसरे नंबर पर था। मुझे याद है कि मेरी स्मरण शक्ति और क्रिएटिविटी कल्पना शक्ति और कुछ नया करने का उत्साह बहुत था। खैर, जीप हमें खुली घाटी में ले आई। यह था चंद्र और भागा का संगम स्थल। पश्चिम में चट्टानी भयावह पर्वत, जिसके माथे पर भूरी स्लटी तिरछी तहें . जैसे शिव ने क्रोध से भृकुटी तनी हो और इस वृहद् प्रस्तर महा पिण्ड के पैंदे में बिछा हुआ गौशाल गाँव। हरा भरा। मुझे बताया गया कि वह एक बड़ा उपजाऊ क्षेत्र है और वहां काई धनाढ्य लोग रहते हैं। अब तक हमारी जीप याद नहीं कितने किलोमीटर तक उत्तर वाले विशाल पर्वत के एक ही ओर चक्कर लगा कर तांदी पहुंची तो लगा कि अब हमें एक पुल लांघ कर उत्तर पूर्व की ओर मुड़ना था, जिस ओर से शुद्ध नीली हरी चन्द्र नदी के घेरे आते हुए लग रहे थे .
Monday, 29 February 2016
भासा दीया ओड्डिया च
भासा दीया ओड्डिया च प्रैम पी:ह्ण पाई रक्खा।
जा:ह्लू तीएं कुल्हा पाणी घराट्टे जो चलाई रक्खा।
**
बीई भाईचारे दे लगी पौह्ण उंगरना
औणे आळे सम्बते जो ऊरीयां लगाई रक्खा।
**
गोड्डियाँ गुडाई रक्खा कुल्हां पाणी लाइ रक्खा
सूरां कनै बान्द्रां ते खेतीया बचाई रक्खा।
**
जेह्ड़ा 'खुराफात्ती' खरपात मुण्ड चुक्की औयै
समेत ज:ह्डाँ पुट्टी करी ती:ह्जो ला:ह्मबैं लाई रक्खा।
**
बाडां होईयाँ चौड़ीयां खेतरंजो खाणा प्:ह्यीयां
रळी मिळी व:ह्ड्डी टुक्की तिन्हें सूतैं पाई रक्खा।
**
बेह्लडां बौळ्दां जो खरीया मत्ती लाई रक्खा
हळ्लैं जुंगडैं लाई रक्खा सुक्क़ीया गा:ह्णी पाई रक्खा।
**
वसदेयां घरां आस प्रौह्णेयां दी लाई रक्खा
मन्जा अंगणे डा:ह्यी रक्खा चुल्हैं चा:ह् चढ़ाई रक्खा।
**
अप्पणीयां हौआँ कनै अम्बर भी अप्पणा ही
व्चारां दीयां उच्चीयां पतंगा जो उड़ाई रक्खा।
**
को:ह्की काळा भेड्डू जा:ह्णी मुच्ची नै पेच्चा पायै
कट्टी नै पतंग ती:ह्दी धूड़ी च ऱुळाई रक्खा।
**
घरैं घुसड़ी नै जिन्हा खिं:न्दा फग्गळ पाई ते:ह्यो
छुप्पीयाँ छछूंदरां जो कड़ाकीयां लगाईं रक्खा।
**
हरियाणे जाळी-फूक्की धीयाँ भैणां वी नी दिक्खीयाँ
लोहड़ीया दे 'दुल्ले भट्ठे' आळे जो भुलाई रक्खा।
**
सोह्णे फुल्ले दिक्खी नै डाळीया ते तोड़ा मत
रब्ब दीयां रू:हाँ बिच्च मन चित्त लाई रक्खा।
**
'वुसुआस' ई:न्ज्या बोळणे जो इक्क पल लग्गदा
समझणे समझाणे जो पूरी जिंद लाई रक्खा।
**
भास्णा दे रासणां नै ढिड्ड हण फटी जाणे
चज्ज दा कोई कम्म करा इतणा सुझाई रक्खा।
**
प्हाड़ीया दीयां रौणकां भई पञ्चो तुसे लाई रक्खा
भासा दीया धूणीयाँ दी अग्गी सुळ्गाई रक्खा।
****
जा:ह्लू तीएं कुल्हा पाणी घराट्टे जो चलाई रक्खा।
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बीई भाईचारे दे लगी पौह्ण उंगरना
औणे आळे सम्बते जो ऊरीयां लगाई रक्खा।
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गोड्डियाँ गुडाई रक्खा कुल्हां पाणी लाइ रक्खा
सूरां कनै बान्द्रां ते खेतीया बचाई रक्खा।
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जेह्ड़ा 'खुराफात्ती' खरपात मुण्ड चुक्की औयै
समेत ज:ह्डाँ पुट्टी करी ती:ह्जो ला:ह्मबैं लाई रक्खा।
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बाडां होईयाँ चौड़ीयां खेतरंजो खाणा प्:ह्यीयां
रळी मिळी व:ह्ड्डी टुक्की तिन्हें सूतैं पाई रक्खा।
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बेह्लडां बौळ्दां जो खरीया मत्ती लाई रक्खा
हळ्लैं जुंगडैं लाई रक्खा सुक्क़ीया गा:ह्णी पाई रक्खा।
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वसदेयां घरां आस प्रौह्णेयां दी लाई रक्खा
मन्जा अंगणे डा:ह्यी रक्खा चुल्हैं चा:ह् चढ़ाई रक्खा।
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अप्पणीयां हौआँ कनै अम्बर भी अप्पणा ही
व्चारां दीयां उच्चीयां पतंगा जो उड़ाई रक्खा।
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को:ह्की काळा भेड्डू जा:ह्णी मुच्ची नै पेच्चा पायै
कट्टी नै पतंग ती:ह्दी धूड़ी च ऱुळाई रक्खा।
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घरैं घुसड़ी नै जिन्हा खिं:न्दा फग्गळ पाई ते:ह्यो
छुप्पीयाँ छछूंदरां जो कड़ाकीयां लगाईं रक्खा।
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हरियाणे जाळी-फूक्की धीयाँ भैणां वी नी दिक्खीयाँ
लोहड़ीया दे 'दुल्ले भट्ठे' आळे जो भुलाई रक्खा।
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सोह्णे फुल्ले दिक्खी नै डाळीया ते तोड़ा मत
रब्ब दीयां रू:हाँ बिच्च मन चित्त लाई रक्खा।
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'वुसुआस' ई:न्ज्या बोळणे जो इक्क पल लग्गदा
समझणे समझाणे जो पूरी जिंद लाई रक्खा।
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भास्णा दे रासणां नै ढिड्ड हण फटी जाणे
चज्ज दा कोई कम्म करा इतणा सुझाई रक्खा।
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प्हाड़ीया दीयां रौणकां भई पञ्चो तुसे लाई रक्खा
भासा दीया धूणीयाँ दी अग्गी सुळ्गाई रक्खा।
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Tuesday, 23 February 2016
किच्छ् भी हासल करने तयींएं
अपणा कुच्छ गुआणा पौंदा।
अपणी जगह बणाणे तयींएं
अपणा मुल्ल लुआणा पौंदा।
कुर्सिया दीया चास्सा कनैं हो:ईयो
जेहड़े जक्ख् नैं अन्हें
सुच्चिया अग्गी भ:ख्या चिमटा
कुस्की जो तां छु:आणा पौंदा।
जेहड़े जक्ख् नैं अन्हें
सुच्चिया अग्गी भ:ख्या चिमटा
कुस्की जो तां छु:आणा पौंदा।
बोलणे आळे मते कठरो:ह्यो
देश भगतीया दे म:झमेँ ला:ह्यो
बड़ीयाँ गल्लां बड़े मच:ल्लण
न्हेरिया पत्थर ढोई ला:ह्यो
सरह्द्दां जो सगणे तयींएं
वीराँ जो लहु गुआणा पौंदा।
देश भगतीया दे म:झमेँ ला:ह्यो
बड़ीयाँ गल्लां बड़े मच:ल्लण
न्हेरिया पत्थर ढोई ला:ह्यो
सरह्द्दां जो सगणे तयींएं
वीराँ जो लहु गुआणा पौंदा।
जाह्ली जैह्रे दी पुङ्ग थी लुंगी
कैंह् नी ढक्का ते दित्ती ठुंग्गी
हण जे बेल्लां चढ़ीयां गासैं
बिछणा लागींयां चौह्नी पास्सें
जां जे झळसोणा लग्गे पास्से
अग्गी कम्बळ ह्डुआणा पौंदा।
कैंह् नी ढक्का ते दित्ती ठुंग्गी
हण जे बेल्लां चढ़ीयां गासैं
बिछणा लागींयां चौह्नी पास्सें
जां जे झळसोणा लग्गे पास्से
अग्गी कम्बळ ह्डुआणा पौंदा।
मैं जे बोल्ला तां लगणी कौड़ी
लग्गै बज्जदी सिरें हथौड़ी
अझें भीई मन्नी लै तू कै:ह्णा
ठन्डे डमाक्कें सोची लैणा
होर्नि चिक्कड़ सट्टणे ते पै:ह्लें
अपणा मुंह धुआणा पौंदा।
***
लग्गै बज्जदी सिरें हथौड़ी
अझें भीई मन्नी लै तू कै:ह्णा
ठन्डे डमाक्कें सोची लैणा
होर्नि चिक्कड़ सट्टणे ते पै:ह्लें
अपणा मुंह धुआणा पौंदा।
***
Wednesday, 16 July 2014
बचपन के लाहौल यात्रा के संस्मरण
हमीरपुर का गाँव
मार्च 1965 में मैं आठवीं पास हो गया था। पढाई में मैं अव्वल था परन्तु अपने हायर सेकेंडरी स्कूल हमीरपुर में मैं दूसरे नंबर पर था। पारितोष में मुझे एक किताब मिली थी "राबिन्स क्रूसो" जिसे मैंने बड़े दिल से पढ़ा था। उन्ही दिनों में पिता जी का तबादला केलौंग हो गया था। उन दिनों लाहौल स्पीती जाना बड़े साहस और जोखिम वाली बात हुआ करती थी। एक तो यातायात के साधन न के बराबर थे। सड़कें कच्ची थीं और सबसे बडी चनौती थी रोह्तांग दर्रे को क्रॉस करना। सुना करते थे कि वहां केवल मांस अंडा खाने वाले ही जी पाते थे ,शाकाहारियों के वश की बात नही थी। पिताजी के वहां जाने के उत्साह के आगे लोगों के डरावे क्षीण हो गए और अन्तत: उन्होंने कुछ आवश्यक सामान ले कर हमीरपुर से मनाली के लिए बस पकड़ ली। बस अड्डे पर उन्हें छोड़ने के वक्त मैं उनके साथ ही था। बस के जाते ही मेरे मन में जो भयंकर अवसाद हुआ उसे शब्दों में जाहिर नहीं कर सकता और मेरी आँखों में परल-परल अश्रु धार बह निकली थी। मैं स्वयं को निस्सहाय और डाली से टूटे हुए पत्ते की तरह महसूस करने लगा था। खैर तय यह हुआ था की पिता जी ने केलांग में जा कर वहां का ठौर ठिकाना देखना था और हमने बाद में घर का जरूरी सामान लेकर वहां मामा जी के साथ जाना था। अनूप अभी छोटा था मासूम सा।
हमें केलांग जाने का भय मिश्रित उछाह था। नानू जी हमारा बहुत ख्याल रखते थे। उन्होंने बहुत सी खाद्य सामग्री जिसमें कच्चे आमों की सकोरीयाँ, पक्के आमों के रस को सुखाये हुए आम-पापड़, सुखाई हुई सब्जीयाँ, सूखा पनीर, घरेलु नुस्खों वाली दवाईयां और न जाने क्या क्या तैयार कर के बाँध दीं। मुझे याद है कि सामान के बहुत ज्यादा नग हो गए थे। बड़े मामा जी को हमारे साथ भेजने के लिए नियुक्त किया गया था।
जुलाई के भीगे महीने में मनाली तक का सफ़र बस में किया। इस दौरान धूप छाँव और कांगड़ा पालमपुर की हरी भारी वादियों, जल निमग्न कच्चे हरे धान के खेतों के बीच बस निकलती तो कई बार बासमती की महक का झोंका भी आता। इन सब नज़ारों से अलग साथ साथ चलती नीली धौलाधार जिस के नूकीले सिरों पर चांदी के आड़े तिरछे त्रिकोण नजर आते। कभी कभी चीड़ के स्याह को लांघते हुए बरखा की फुहारों का आनंद अभी तक स्मृति में ताज़ा लगता है। जोगिन्दर नगर से आगे घटासनी की ऊंची मोड़दार सड़क और खड़ी चढ़ाई पर बस के इंजन की गूँज से पता चलता था की बस की बस हो गई हो। फिर मंडी पहुँचने से पूर्व दिखने लगतीं हैं गहरी नीली पहाड़ियों में उलझी हुई बादलों की चिट्टी चादरें। मण्डी पहुंचते पहुंचते शाम घिर आई थी। मण्डी में हमारे रिश्तेदार थे ओ पी आनंद। शहर के जाने माने शख्श और संपन्न भी। हम सभी उनके घर पहुंचे तो झुरमुट शाम रात में बदल गई थी। शहर की लाईटें जग गईं थीं। उस रात उनके परिवार का प्रोग्राम सिनेमा देखने का बना हुआ था। वे हमें भी आग्रह पूर्वक साथ ले गए। थियेटर में शहीद फ़िल्म चल रही थी नई नई। उस पिक्चर में भारत-चीन के युद्ध को दर्शाया गया था। हमारे नौजवानों ने कैसे ऊंचे वर्फीले हिमालय में देश की खातिर अपनी जान की बाजी लगा दी थी। उस फ़िल्म के गाने बहुत हिट हुए थे। उसमें एक गाना यह भी है "कर चले हम फिदा जानो तन साथियो ,अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो। उन वर्फ के दृश्यों का असर यह हुआ कि मुझ में ठण्ड से लड़ने का अदम्य साहस जागृत हो गया। अगली सुबह बहुत तड़के मनाली के लिए बस पकड़ ली। यह बारदात बड़ी पुरानी है। आज की तरह की सड़कें थोड़े ही थीं। मण्डी से कुल्लू की सड़क कच्ची और उबड़ खाबड़ थी जो कि उफनती हुई ब्यास नदी के किनारे किनारे ही थी। दरिया का वो रौद्र रूप आज भी जब याद आता है तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। आउट से आगे लगभग ब्यास दूर हो गई और कुल्लू मनाली की यात्रा बड़ी रोचक हो गई। हरियाली और प्राकृतिक सौन्दर्य के साथ साथ हवा के शीतल झोंके। शाम को मनाली पहुन्चे। उधर पिताजी केलांग से हमें लेने के लिए मनाली आ गए थे। धार्मिक प्रवृत्ति होने के कारण पिताजी को देव स्थानों में बड़ी रूचि थी। मामाजी तो उनसे आगे बढ़कर हैं। प्रात: उठकर हम सभी ऋषि वशिस्ठ चले गए। गर्म पानी के चश्मों में स्नान किया और अपने आप को धन्य समझा। मामाजी वापिस हमीरपुर लौट गए.. सामान के नग खच्चरों पर लदवा कर हम चारों यानि मैं अनूप बीजी व् पिताजी बस पकड़ कर राहला के लिए रवाना हो गए। राहला वो जगह है जहां से रोहतांग दर्रे के लिए चढ़ाई आरम्भ होती है। लगता है जैसे तीनों ओर से ऊंचे पहाड़ों के पैंदे राहला में आ कर रुक गए हों। ऊँचे घने पेड़ों के नीचे एक घुमावदार उथला बहता हुआ नाला था जिसका पानी बहुत ठंडा था। उसके दोनों ओर जहां कहीं भी समतल जगह थी उसमें तिब्बती शरणार्थियों के तम्बू थे। ये लोग लेबर क्लास के लगते थे। ग़रीबी और गंदगी का सामजस्य। नाले के साथ साथ कच्ची सड़क जाती थी जो कीचड़ और खच्चरों की लीद से लथपथ थी और वो लीद की तीखी दुर्गन्ध आज तक मेरे जहन में घुसी हुई है। घर का सारा सामान आगे खच्चरों पर ले जाया जाना था। राहला से एकदम चढ़ाई शुरू होती थी। मुझे याद है पूर्व की ओर यह चढ़ाई वाला रास्ता था जो कि बड़े गोल पत्थरों से बना था। खच्चर भी उसी रास्ते से के साथ साथ हो कर निकलते थे परन्तु अपना अलग ट्रैक बना कर। हम लोग मढ़ी तक पैदल चढ़ कर गये। दिन दिन में ही मढ़ी पहुँच गए परन्तु बेहद थके हुए। इस जगह केवल तम्बूनुमा होटल थे ,बहुत कम। सामने पूर्व की दिशा में जल प्रपात दिख रहा था। लगता था की आधा पानी ही नीचे नाले में पहुँच रहा हो और शेष धुंध में परिवर्तित हो जाता हो। रात को कड़ाके की ठण्ड हो गई। असह्य। एक तम्बुनुमा होटल जहां खाना खाया ,वहीं रात भी काटी। सोने के लिए मात्र शिला निर्मित बैंच ही था। अपने पूरी गर्म कपडे पहन लिए और कम्बल ओढ़ कर वहीं दुबके रहे। सुबह जल्दी चाय नाश्ता करने के बाद रोहतांग के लिए रवाना हो गए ,रक्त जमा देने बाली फर्न-फर्न हवाओं को काटते हुए। जोश और उमंग से भरे हुए धीरे धीरे रोहतांग की ओर बढ़ने लगे। बर्फ के तोदों के बीचों बीच, पत्थरीली कहीं कच्ची सड़क, अनगिनत मोड़ों बाली। मैं सब को पीछे छोड़ कर आगे बढ़ता गया और सड़क के किनारे की वर्फ की दीवारों पर अपने छाते से कुछ लिखता गया ताकि पीछे आने वाले पढ़ सकें। हवा पतली हो रही थी और सांस अधिक फूलने लगा गया था। मुझे आज भी हैरानी होती है कि वह ठण्ड से लड़ने की शक्ति न जाने कहाँ से आ गई थी। रास्ते में शायद बी एस ऍफ़ के जबान और बुलडोजर भी काम पर लगे हुए थे। काफी देर के बाद ये सभी ऊपर दर्रे के पास यात्रियों की सहायतार्थ लगे बी एस ऍफ़ के टैंट के समीप पहुंचे। उस समय हमारे हाथ पाँव बुरी तरह से ठन्डे हो चुके थे। टैंट में तैनात नौजबानों ने गर्मागर्म और कड़क चाय पिलाई जिसका स्वाद अभी तक याद है। वहीं हमने व्यास कुण्ड , ब्यास का उद्गम स्थान और उस प्रस्तर शिला के दर्शन
भी किये जिस पर वेद ब्यास ऋषि ने तपस्या की थी. यह काफी बड़ी शिला है जिसकी ऊपरी सतह समतल है। विस्मय होता है वेद ब्यास के असाधारण व्यकित्व पर और शारीरिक क्षमता पर जिन्होंने इतनी जानलेवा ठण्ड में निर्विघ्न समाधि ली और बाद में उन्होंने महाभारत ग्रन्थ की रचना की उसी में श्रीमद्भग्वत गीता भी सम्मिलित है जो की दुनिया भर में सर्वोत्कृष्ट अध्यात्मिक पुस्तक मानी जाती है। हमारे शास्त्रों में यह भी उधृत है की इस ग्रन्थ का लेखन का कार्यभार श्री गणेश ने स्वयं अपने ऊपर लिया था।
चलो आगे चलते हैं। कुछ देर अपनी ऊर्जा को समेटने के बाद हम लोग रोह्तांग दर्रे की ओर बढ़ गए। बुलडोज़रों की सहायता से बर्फ को काट कर बनी हुई सड़क जिस पर चलना जोखिम भरा कार्य था क्योंकि वर्फ और कीचड़ से गच्च सड़क थी जिस पर घोड़ों के खुरों ने उबड़ खाबड़ कर छोड़ा था। सड़क के दोनों ओर वर्फ की ऊंची दीवारें नजर आती थीं। जितना मुझे याद है यह सड़क उत्तर की ओर जाती है। जैसे ही उस सुरंग नुमा सड़क को पार किया तो सामने उत्तर की ओर के भूरे रंग के शुष्क और बेहद कठोर पर्वत दिखने लगा जो रोह्तांग दर्रे से काफी ऊंचा था। उसकी विशेष प्रकृति को देख कर मन में अद्भुत दुनिया की कल्पना जाग उठी। ये तो ईश्वरीय प्रतीत होता था। भगवान शिव के विराट स्वरूप जैसा। इसमें जीवन की हरियाली तो थी ही नहीं। इस के पाँव अपरिमित गह्वर खाई में छुपे लगते थे। अब सड़क में उतराई शुरू हो गई। मोड़ों वाली सड़क जिसका एक -एक मोड़ आधे किलोमीटर से अधिक ही होगा। हम तो शार्टकट रास्तों से नीचे उतरते गए। हुआ यह कि बीच में ओलावृष्टि शुरू हो गई जिससे हम आतंकित हो गए। शाम घिरने से पूर्व हम खोक्सर जा पहुंचे। भागा नदी के तट के साथ तम्बुनुमा होटल में जा कर थकान उतारने के लिए चाय पान किया। नदी पार कर के छोटी कच्ची सड़क थी जो केलांग को जोड़ती थी। इस सड़क के साथ वाले कुछ हिस्से तक बहुत ही नर्म घास दिखाई देती थी। हम एक जीप में बैठ कर केलांग के लिए चल पड़े। जीप ठस्स्मठस भरी हुई थी। दरिया के साथ साथ फिर ऊंचाई पर पहाड़ की तराई पर कुछेक वस्तियाँ भी नजर आने लगीं। ज्यादातर बौद्ध गोम्पा और स्तूप दिखते। यह अलग ही दुनियाँ है। पहाड़ की चोटी कभी नजर नहीं आई.
Saturday, 7 July 2012
blog dhauladhar
श्री सुखराज सिन्ह की लिखी अंग्रेज़ी में कविता का हिन्दी में रुपान्तरण
Welcome Storms
Welcome Dark Clouds
Welcome Rains.
Those Farmers gaping towards horizon in search of you,
Have Started Believing in God again.
Come drench us all on earth, take the filth out.
Surrendered !!
स्वागत है तूफानों का
स्वागत है घन-घोर घनों का
स्वागत है बौछारों का.
वो खेतीहर ताक रहे दिकमण्डल पर फिराक तुम्हारी,
शुरू कर दी प्रतीति रब्ब में दोबारा.
आओ हम सब को सिक्त करो धरा को कचरा-रिक्त करो.
हम अभिभूत!!
Tuesday, 10 April 2012
सुकर मना:ह
![]() |
| मुच्छड़ - कागज पर पेंसिल से मुदित की रचना |
सुकर मना:ह भई सिर नी फुट्टे, लक्क-लत्तां ई भज्जीयां
मने पतेया:ह मुक्के नी भुक्खे, मिलदीयां रहीयां र:ज्झीयां.
अपणेयां-निप्पणेयां कुतु कजो मिलणा, होई गई गल्ल पुराणी,
बख्त मै:न्गा, कुण टिकटां लै:ह्न्गा, कुनी जहाज्जैं बुकंग कराणी.
रब्ब ते डरां, सुकर करां, अपणे भी:बी ढुकी पौन्दे बड्डीया-चड्डीया.
मकान च्णोई गै, रस्ते संगड़ोई गै, घर-घर खड़ूई गईयां गड्डीयां,
खेत्तर मुक्की गै, नाळू सुक्की गै, पर सड़कां होई गईयां वड्डीयां,
सड़का टप्पणा- मौत्ती सदणा, कुनी भनाणीयां पुराणीयां हड्डीयां.
दाड़ी दा मेल्ला, मा:ह्णुआं दा रेल्ला, कारां कनै कार जुड़ी ग:ईयो,
धक्के पर धक्का, प्रा:ह्लैं धूड़ी दा फक्का, पी:हो-पी:ह पई गई:यो
भी:बि सुकर मना:ह, अझैं च:लेया साःह, हंडणे जो बच्चीयां कुछ पगडन्डीयां.
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